रावण जब सीता माता के पास विवाह प्रस्ताव लेकर गया तो माता ने द्रुवा के एक टुकड़े को अपने और रावण के बीच रखा व कहा,'हे रावण!सूरज और किरण की तरह राम-सीता अभिन्न हैं।राम व लक्ष्मण की अनुपस्थिति में मेरा अपहरण कर तुमने कायरता का परिचय दिया व राक्षस जा‍ति के विनाश को आमंत्रित किया है।

तुम्हारा श्रीरामजी की शरण में जाना ही इस विनाश से बचने का एकमात्र उपाय है अन्यथा लंका का विनाश निश्चित है।'
सीता माता की इस बात से निराश रावण ने राम को लंका आकर सीता को मुक्त करने को दो माह की अवधि दी। इसके बाद रावण या तो सीता से विवाह करेगा या उसका अंत।
रावण ने सीता को हर तरह के प्रलोभन दिए।यदि वह उसकी पत्नी बन जाए तो वह अपनी सभी पत्नियों को उसकी दासी बना देगा और उसे लंका की राजरानी। लेकिन सीता माता रावण के किसी भी तरह के प्रलोभन में नहीं आईं। तब रावण ने सीता को जान से मारने की धमकी दी लेकिन यह धमकी भी काम नहीं कर पाई।
इसके बाद रावण के पास सीता माता की हां के इंतज़ार के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा क्योंकि ज़ोर-जबरदस्ती वो कर नहीं सकता था।
आखिर क्यों रावण सीता माता के साथ जबरदस्ती नहीं कर सकता था? आइए जानते हैं।
रावण के भाई कुबेर द्वारा निर्मित सोने की लंका अद्भुत,अगम्य,भव्य और दिव्य थी, जिसकी सुंदरता देखते ही बनती थी। उसी कुबेर के पुत्र नलकुबेर की होनेवाली पत्नी थी अप्सरा रंभा जिसके सौंदर्य पर रावण मोहित हो गया था।
एक बार जब विश्व-विजय करने के लिए रावण स्वर्गलोक पहुंचा तो उसे वहां...
...अप्सरा रंभा दिखाई दी। वह उसके रूप-यौवन को देख कर मोहित हो गया और कामातुर होकर उसे पकड़ लिया। तब रंभा ने रावण से कहा कि आप मुझे इस प्रकार स्पर्श न करें, मैं आपके भाई कुबेर के बेटे नलकुबेर की होनेवाली पत्नी हूं और आपकी पुत्रवधू के समान हूं।
रंभा ने रावण को मर्यादाओं का ध्यान रखते हुए उसे छोड़ देने को कहा।लेकिन रावण ने उसकी एक नहीं सुनी और सारी मर्यादाओं को ताक पर रखते हुए उसके साथ दुराचार किया। यह बात जब नलकुबेर को पता चली तो वह रावण पर अत्यंत क्रोधित हुआ और क्रोधित होकर उसने उसे शाप दे दिया।नलकुबेर के शापनुसार,...
..यदि इस घटना के बाद रावण ने किसी भी स्त्री को बिना उसकी स्वीकृति के अपने महल में रखा या उसे स्पर्श किया तो उसी क्षण उसके मस्तक के सौ खण्ड हो जाएंगे और वह भस्म हो जाएगा।इसी शाप के चलते रावण चाहते हुए भी सीता माता को अपने महल में नहीं रख सका और न ही कभी सीता माता को स्पर्श कर सका।
लंका में माता सीता ने अपना सारा समय अशोकवाटिका में व्यतीत किया जहां राक्षसी त्रिजटा ने माता की बड़ी हिम्मत बंधाई।त्रिजटा ही माता को ये बात बताती है कि रावण से डरने की कोई ज़रूरत नहीं क्योंकि वह नलकुबेर के शाप के चलते कभी तुम्हें स्पर्श नहीं कर सकता जिसे सुन माता का साहस बंधता है।

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🌺कैसे बने गरुड़ भगवान विष्णु के वाहन और क्यों दो भागों में फटी होती है नागों की जिह्वा🌺

महर्षि कश्यप की तेरह पत्नियां थीं।लेकिन विनता व कद्रु नामक अपनी दो पत्नियों से उन्हे विशेष लगाव था।एक दिन महर्षि आनन्दभाव में बैठे थे कि तभी वे दोनों उनके समीप आकर उनके पैर दबाने लगी।


प्रसन्न होकर महर्षि कश्यप बोले,"मुझे तुम दोनों से विशेष लगाव है, इसलिए यदि तुम्हारी कोई विशेष इच्छा हो तो मुझे बताओ। मैं उसे अवश्य पूरा करूंगा ।"

कद्रू बोली,"स्वामी! मेरी इच्छा है कि मैं हज़ार पुत्रों की मां बनूंगी।"
विनता बोली,"स्वामी! मुझे केवल एक पुत्र की मां बनना है जो इतना बलवान हो की कद्रू के हज़ार पुत्रों पर भारी पड़े।"
महर्षि बोले,"शीघ्र ही मैं यज्ञ करूंगा और यज्ञ के उपरांत तुम दोनो की इच्छाएं अवश्य पूर्ण होंगी"।


महर्षि ने यज्ञ किया,विनता व कद्रू को आशीर्वाद देकर तपस्या करने चले गए। कुछ काल पश्चात कद्रू ने हज़ार अंडों से काले सर्पों को जन्म दिया व विनता ने एक अंडे से तेजस्वी बालक को जन्म दिया जिसका नाम गरूड़ रखा।जैसे जैसे समय बीता गरुड़ बलवान होता गया और कद्रू के पुत्रों पर भारी पड़ने लगा


परिणामस्वरूप दिन प्रतिदिन कद्रू व विनता के सम्बंधों में कटुता बढ़ती गयी।एकदिन जब दोनो भ्रमण कर रहीं थी तब कद्रू ने दूर खड़े सफेद घोड़े को देख कर कहा,"बता सकती हो विनता!दूर खड़ा वो घोड़ा किस रंग का है?"
विनता बोली,"सफेद रंग का"।
तो कद्रू बोली,"शर्त लगाती हो? इसकी पूँछ तो काली है"।

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॥ॐ॥
अस्य श्री गायत्री ध्यान श्लोक:
(gAyatri dhyAna shlOka)
• This shloka to meditate personified form of वेदमाता गायत्री was given by Bhagwaan Brahma to Sage yAgnavalkya (याज्ञवल्क्य).

• 14th shloka of गायत्री कवचम् which is taken from वशिष्ठ संहिता, goes as follows..


• मुक्ता-विद्रुम-हेम-नील धवलच्छायैर्मुखस्त्रीक्षणै:।
muktA vidruma hEma nIla dhavalachhAyaiH mukhaistrlkShaNaiH.

• युक्तामिन्दुकला-निबद्धमुकुटां तत्वार्थवर्णात्मिकाम्॥
yuktAmindukalA nibaddha makutAm tatvArtha varNAtmikam.

• गायत्रीं वरदाभयाङ्कुश कशां शुभ्रं कपालं गदाम्।
gAyatrIm vardAbhayANkusha kashAm shubhram kapAlam gadAm.

• शंखं चक्रमथारविन्दयुगलं हस्तैर्वहन्ती भजै॥
shankham chakramathArvinda yugalam hastairvahantIm bhajE.

This shloka describes the form of वेदमाता गायत्री.

• It says, "She has five faces which shine with the colours of a Pearl 'मुक्ता', Coral 'विद्रुम', Gold 'हेम्', Sapphire 'नील्', & a Diamond 'धवलम्'.

• These five faces are symbolic of the five primordial elements called पञ्चमहाभूत:' which makes up the entire existence.

• These are the elements of SPACE, FIRE, WIND, EARTH & WATER.

• All these five faces shine with three eyes 'त्रिक्षणै:'.

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