🌺कैसे बने गरुड़ भगवान विष्णु के वाहन और क्यों दो भागों में फटी होती है नागों की जिह्वा🌺

महर्षि कश्यप की तेरह पत्नियां थीं।लेकिन विनता व कद्रु नामक अपनी दो पत्नियों से उन्हे विशेष लगाव था।एक दिन महर्षि आनन्दभाव में बैठे थे कि तभी वे दोनों उनके समीप आकर उनके पैर दबाने लगी।

प्रसन्न होकर महर्षि कश्यप बोले,"मुझे तुम दोनों से विशेष लगाव है, इसलिए यदि तुम्हारी कोई विशेष इच्छा हो तो मुझे बताओ। मैं उसे अवश्य पूरा करूंगा ।"
कद्रू बोली,"स्वामी! मेरी इच्छा है कि मैं हज़ार पुत्रों की मां बनूंगी।"
विनता बोली,"स्वामी! मुझे केवल एक पुत्र की मां बनना है जो इतना बलवान हो की कद्रू के हज़ार पुत्रों पर भारी पड़े।"
महर्षि बोले,"शीघ्र ही मैं यज्ञ करूंगा और यज्ञ के उपरांत तुम दोनो की इच्छाएं अवश्य पूर्ण होंगी"।
महर्षि ने यज्ञ किया,विनता व कद्रू को आशीर्वाद देकर तपस्या करने चले गए। कुछ काल पश्चात कद्रू ने हज़ार अंडों से काले सर्पों को जन्म दिया व विनता ने एक अंडे से तेजस्वी बालक को जन्म दिया जिसका नाम गरूड़ रखा।जैसे जैसे समय बीता गरुड़ बलवान होता गया और कद्रू के पुत्रों पर भारी पड़ने लगा
परिणामस्वरूप दिन प्रतिदिन कद्रू व विनता के सम्बंधों में कटुता बढ़ती गयी।एकदिन जब दोनो भ्रमण कर रहीं थी तब कद्रू ने दूर खड़े सफेद घोड़े को देख कर कहा,"बता सकती हो विनता!दूर खड़ा वो घोड़ा किस रंग का है?"
विनता बोली,"सफेद रंग का"।
तो कद्रू बोली,"शर्त लगाती हो? इसकी पूँछ तो काली है"।
काफी देर बहस करने के बाद दोनो ने शर्त लगा ली।कद्रू ने कहा कि जोभी शर्त हारेगी उसे जीतने वाली की दासी बनना पड़ेगा।रात को ही कद्रू ने अपने सर्प पुत्रों को बुलाकर कहा,"आज रात को ही तुम उस श्वेताश्व की पूंछ से जाकर लिपट जाना ताकि जब सुबह विनता उसे देखे तो उसे उसकी पूंछ काली नज़र आए"।
नागपुत्र जाकर घोड़े की पूंछ से लिपट गए।प्रात: जब विनता ने यह देखा तो वह हैरान रह गयी और बोली,"ऐसा कैसे हो गया?कल तो इसकी पूंछ बिल्कुल सफेद थी।"
कद्रू बोली,"तुम शर्त हार गयी हो,इसलिए अब तुम्हे मेरी दासी बनकर ही रहना पड़ेगा।" विवश होकर विनता को दासता स्विकारनी पड़ी ।
मां को उदास देखकर गरुड़ व्याकुल हो उठा व माता से उदासी का कारण पूछा।
विनता ने आपबीती सुनाई तो गरुड़ ने पूछा,"क्या कोई ऐसा उपाय नहीं जिससे आप कद्रू की दासता से मुक्त हो सकें?"
विनता बोली,"ये तो कद्रू से पूछना पड़ेगा"।कद्रू से पूछा तो उसने कहा कि यदि तुम मेरे पुत्रोंको अमृत ला दो..
..तो मैं तुम्हे दासता से मुक्त कर दूंगी।जब गरुड़ को ये पता चला तो वो सोचने लगा कि अमृत कहां मिलेगा।अपनी माता से पूछने पर मां ने कहा,"पुत्र!अमृत का पता तुम्हारे पिता ही बता सकते हैं।"
ये सुन गरुड़ अपने पिता महर्षि कश्यप के पास जा पहुँचा।पुत्र को देख ऋषि प्रसन्न हुए और...
...उनके आने का कारण पूछा।गरुड़ ने सारा वृतांत पिता को सुनाया और पूछा की अमृत कहां मिलेगा?महर्षि बोले,"पुत्र!देवराज इन्द्र ने कड़ी सुरक्षा के अन्दर अमृत को अमृत सरोवर में रखा है जहां पहुंचना बहुत कठिन है।गरुड़ बोले कि चाहे कितने ही कठोर प्रबंध क्यों न हो पर मैं अमृत अवश्य लाउंगा ।
महर्षि ने इन्द्र का पता गरुड़ को बताया।तब गरुड़ बोले,"पिताजी मुझे भूख बहुत लगती है।इस लम्बे मार्ग पे मैं क्या खाकर अपना पेट भरूं?"
महर्षि बोले,"रास्ते में सागर किनारे तुम्हे निषादों की बस्तियां मिलेंगी।ये निषाद पतित हैं और असुरों सा आचरण करते हैं।तुम इन्हे खाके अपनी भूख मिटाना।"
गरुड़ बोले,'यदि उसके बाद भी क्षुधा शान्त न हो तो?'तो महर्षि बोले,'सरोवर के अन्दर एक विशाल कछुआ और साथ के वन में एक भयंकर हाथी रहते हैं।दोनों आसुरी प्रवृत्ति के हैं।तुम उन्हें भी खा सकते हो।'
पिता का आदेश पा गरुड़ अमृत सरोवर की ओर उड़ चले।मार्ग में निषादों को खाकर भूख मिटाई ।
अमृत सरोवर पहुंचके कछुए और हाथी को अपने पंजों में दबाकर आनंदपूर्वक उनका आहार किया और तृप्त होकर अमृत लाने के लिए उड़ चले।सरोवर के पास पहुंचकर अमृत की रक्षा करते हुए महाकाय देवों और अमृत कलश के चारों ओर घूमते हुए चक्र को देखकर वह स्तब्ध रह गया।
उसने सोचा की ये देव और चक्र देवराज इन्द्र ने अमृत कलश की सुरक्षा के लिये लगाए हुए हैं और इस चक्र में फसकर मेरे पंख कट सकते हैं। इसलिए मैं सूक्ष्म रूप धारण कर इसके मध्य में प्रवेश करूंगा। गरुड़ को देख देवता उसको खत्म करने के लिये आगे बढ़े।कुछ देव विद्युत गति से गरुड़ पर टूट पड़े ।
लेकिन गरुड़ ने अपने पैने पंजों व तीखी चोंच से देवों को क्षत विक्षत कर उन्हें बेहोश कर दिया।गरुड़ ने अमृत कलश अपने पंजों में दबाया और वापस उड़ चला।होश आते ही देव इन्द्र के पास पहुंचे और इन्द्र को सारा समाचार सुनाया।क्रोधित इन्द्र अपनी देवसेना की एक टुकड़ी और वज्र के साथ गरूड़...
...को पकड़ने के लिए निकल पड़े।आकाश मार्ग से उड़ते हुए इन्द्र ने गरुड़ को देखते ही उसपर वज्र से प्रहार कर दिया।गरुड़ को वज्र का कोई असर नहीं हुआ और केवल एक पंख टूट कर नीचे गिर गया।देव गरुड़ पे टूट पड़े पर गरुड़ अकेले उन सब पे भारी पड़ रहे थे।देव गरुड़ से लड़कर अधमरे हो गए।
देवेन्द्र गरुड़ की वीरता से बहुत प्रभावित हुए और अमृत कलश के बदले कोई वर मांगने को कहा।गरुड़ बोले,'ये अमृत मैं अपने लिये नहीं बल्कि अपनी माता को दासता से मुक्त कराने के लिए नागमाता को देने जा रहा हूँ।इसलिए ये कलश मैं आपको नहीं दे सकता।'
ये सुनकर इन्द्र बोले,'ठीक है,इस समय तुम कलश ले जाओ किन्तु नागों को इसे प्रयोग न करने देना।उचित मौका देख मैं कलश गायब कर दूंगा।'गरुड़ बोला,'यदि मैं तुम्हारी बात मानूं तो बदले में मुझे क्या मिलेगा?'इन्द्र बोले,'तुम्हारे मन पसंद भोजन का वरदान।'
ये सुन गरुड़ अमृत ले कद्रू के पास गया।
गरूड़ बोले,'माते!अपनी प्रतिज्ञानुसार मैं अमृत ले आया।अब कृपा कर आप मेरी मां को दासता से मुक्त करें।'कद्रू ने प्रसन्न होकर उसी क्षण विनता को मुक्त किया और सुबह अमृत अपने पुत्रों को पिलाने का निश्चय कर वहां से चली गयी।'
रात को उचित समय देख गरुड़ ने इन्द्र देवता को अमृत सौंप दिया।
अपने कथनुसार इन्द्र ने गरुड़ को अपना मनपसंद भोजन कर पाने का वरदान दिया।क्योंकि गरुड़ का मनपसंद भोजन नाग हैं,लेकिन वह उन्हें खा नहीं पाता था क्योंकि गरुड़ व नाग सौतेले भाई थे।इसलिए गरुड़ ने ये वरदान लेकर अपनी दुविधा दूर की।
दूसरे दिन जब नाग वहां पहुंचे तो कलश गायब देख दुखी हुए ।
उन्होंने उस कुशा को चाटना शुरु कर दिया जिस पर कलश रखा था, ये सोचकर कि शायद कुछ अमृत कुशा पर गिरा हो।कुशा की तेज़ धार से नागों की जिह्वा दो हिस्सों में फट गयी।आज भी नागों की जिह्वा आगे से दो हिस्सों में फटी होती है।
गरुड़ की मातृभक्ति को देख विष्णु जी बहुत प्रसन्न हुए और उनके...
...सम्मुख प्रकट हुए और गरुड़ को अपना वाहन बनने का वरदान दिया।
गरुड़ बोले,'प्रभु!अहो भाग्य मेरे जो आपने स्वयं मुझे अपना वाहन बनाना स्वीकार किया।आज से मैं हर क्षण आपकी सेवा में रहूंगा और कभी आपको छोड़ के नहीं जाऊंगा।'
इस प्रकार उसी दिन से पक्षीराज गरुड़ भगवन विष्णु के वाहन बन गए ।
सभी देवताओं ने प्रभु विष्णु और उनके वाहन पक्षीराज गरुड़ को प्रणाम किया और गरुड़ के भगवान विष्णु की सेवा में जाते ही सभी देवता भयमुक्त हो गए ।

ओम नमो नारायणा 💞💞🚩
ओम नमो भगवते वासुदेवाए नम:💞💞🌺🚩🙏

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ARE WE FAMILIAR WITH THE MEANING & POWER OF MANTRAS WE CHANT?

Whenever we chant a Mantra in Sanskrit, it starts with 'Om' and mostly ends with 'Swaha' or 'Namaha'. This specific alignment of words has a specific meaning to it which is explained in Dharma Shastra.


Mantra is a Sanskrit word meaning sacred syllable or sacred word. But Mantras r not just words put together,they r also vibrations.The whole Universe is a cosmic energy in different states of vibration &this energy in different states of vibration forms the objects of Universe.

According to Scriptures,Om is considered to be ekaakshar Brahman,which means Om is the ruler of 3 properties of creator,preserver&destroyer which make the
https://t.co/lyhkWeCdtv is also seen as a symbol of Lord Ganesha, as when starting the prayer,it's him who is worshipped 1st.


'Om' is the sound of the Universe. It's the first original vibration of the nothingness through which manifested the whole Cosmos. It represents the birth, death and rebirth process. Chanting 'Om' brings us into harmonic resonance with the Universe. It is a scientific fact.

Therefore, Mantras are described as vibrational words that are recited, spoken or sung and are invoked towards attaining some very specific results. They make very specific sounds at a frequency that conveys a directive into our subconcious.

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कुंडली में 12 भाव होते हैं। कैसे ज्योतिष द्वारा रोग के आंकलन करते समय कुंडली के विभिन्न भावों से गणना करते हैं आज इस पर चर्चा करेंगे।
कुण्डली को कालपुरुष की संज्ञा देकर इसमें शरीर के अंगों को स्थापित कर उनसे रोग, रोगेश, रोग को बढ़ाने घटाने वाले ग्रह


रोग की स्थिति में उत्प्रेरक का कार्य करने वाले ग्रह, आयुर्वेदिक/ऐलोपैथी/होमियोपैथी में से कौन कारगर होगा इसका आँकलन, रक्त विकार, रक्त और आपरेशन की स्थिति, कौन सा आंतरिक या बाहरी अंग प्रभावित होगा इत्यादि गणना करने में कुंडली का प्रयोग किया जाता है।


मेडिकल ज्योतिष में आज के समय में Dr. K. S. Charak का नाम निर्विवाद रूप से प्रथम स्थान रखता है। उनकी लिखी कई पुस्तकें आज इस क्षेत्र में नए ज्योतिषों का मार्गदर्शन कर रही हैं।
प्रथम भाव -
इस भाव से हम व्यक्ति की रोगप्रतिरोधक क्षमता, सिर, मष्तिस्क का विचार करते हैं।


द्वितीय भाव-
दाहिना नेत्र, मुख, वाणी, नाक, गर्दन व गले के ऊपरी भाग का विचार होता है।
तृतीय भाव-
अस्थि, गला,कान, हाथ, कंधे व छाती के आंतरिक अंगों का शुरुआती भाग इत्यादि।

चतुर्थ भाव- छाती व इसके आंतरिक अंग, जातक की मानसिक स्थिति/प्रकृति, स्तन आदि की गणना की जाती है


पंचम भाव-
जातक की बुद्धि व उसकी तीव्रता,पीठ, पसलियां,पेट, हृदय की स्थिति आंकलन में प्रयोग होता है।

षष्ठ भाव-
रोग भाव कहा जाता है। कुंडली मे इसके तत्कालिक भाव स्वामी, कालपुरुष कुंडली के स्वामी, दृष्टि संबंध, रोगेश की स्थिति, रोगेश के नक्षत्र औऱ रोगेश व भाव की डिग्री इत्यादि।

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#ஆதித்தியஹ்ருதயம் ஸ்தோத்திரம்
இது சூரிய குலத்தில் உதித்த இராமபிரானுக்கு தமிழ் முனிவர் அகத்தியர் உபதேசித்ததாக வால்மீகி இராமாயணத்தில் வருகிறது. ஆதித்ய ஹ்ருதயத்தைத் தினமும் ஓதினால் பெரும் பயன் பெறலாம் என மகான்களும் ஞானிகளும் காலம் காலமாகக் கூறி வருகின்றனர். ராம-ராவண யுத்தத்தை


தேவர்களுடன் சேர்ந்து பார்க்க வந்திருந்த அகத்தியர், அப்போது போரினால் களைத்து, கவலையுடன் காணப்பட்ட ராமபிரானை அணுகி, மனிதர்களிலேயே சிறந்தவனான ராமா போரில் எந்த மந்திரத்தைப் பாராயணம் செய்தால் எல்லா பகைவர்களையும் வெல்ல முடியுமோ அந்த ரகசிய மந்திரத்தை, வேதத்தில் சொல்லப்பட்டுள்ளதை உனக்கு

நான் உபதேசிக்கிறேன், கேள் என்று கூறி உபதேசித்தார். முதல் இரு சுலோகங்கள் சூழ்நிலையை விவரிக்கின்றன. மூன்றாவது சுலோகம் அகத்தியர் இராமபிரானை விளித்துக் கூறுவதாக அமைந்திருக்கிறது. நான்காவது சுலோகம் முதல் முப்பதாம் சுலோகம் வரை ஆதித்ய ஹ்ருதயம் என்னும் நூல். முப்பத்தி ஒன்றாம் சுலோகம்

இந்தத் துதியால் மகிழ்ந்த சூரியன் இராமனை வாழ்த்துவதைக் கூறுவதாக அமைந்திருக்கிறது.
ஐந்தாவது ஸ்லோகம்:
ஸர்வ மங்கள் மாங்கல்யம் ஸர்வ பாப ப்ரநாசனம்
சிந்தா சோக ப்ரசமனம் ஆயுர் வர்த்தனம் உத்தமம்
பொருள்: இந்த அதித்ய ஹ்ருதயம் என்ற துதி மங்களங்களில் சிறந்தது, பாவங்களையும் கவலைகளையும்


குழப்பங்களையும் நீக்குவது, வாழ்நாளை நீட்டிப்பது, மிகவும் சிறந்தது. இதயத்தில் வசிக்கும் பகவானுடைய அனுக்ரகத்தை அளிப்பதாகும்.
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சூரியன் உலக இயக்கத்திற்கு மிக முக்கியமானவர். சூரிய சக்தியால்தான் ஜீவராசிகள், பயிர்கள்