Did you know?

When Saudi Arabia's King visited India in 1955, PM Nehru ordered all the Hindu Temples and Idols of Hindu Deities that came in Saudi King's way to be covered up.
Our temples are the architectural marvels in their own league.

Each of our temples tells the story of our rich history and cultural heritage. Was Nehru that ashamed of his own nation's heritage that he had to cover them up or there was some other reason? The answer would be best known to him only.
PM Nehru invited the then Saudi King Saud bin Abdul Aziz to India who accepted the invitation and planned a 17 day long official visit to India in 1955. Saudi King had brought a large delegation with him and he had to visit various Indian cities like Mumbai, Hyderabad, Agra,
Aligarh, Shimla, Mysore and Varanasi. However, when Saudi King reached Varanasi, Nehru ordered to cover all the temples and Idols with curtains that came in the way of the Royal Convoy. During his stay in Varanasi, Govt buildings were painted with the words "Kalma Tayyiba".
'Kalma Tayyiba' means 'There is not God but only Allah and Mohammed is his messenger'. In addition to it, Pooja and Aartis were also stopped at temples. I can call it the appeasement politics of the highest order and Nehru was indeed the greatest appeaser of all times.
But was it really worth it. Can a person stooge to that level of lowness just to appease a powerful person of different faith. How can anybody's conscience agree to it?
Varanasi is an ancient holy city of India which is full of ancient temples and rich cultural heritage.
Varanasi was the city that was brutally attacked and destroyed in several consecutive Islamic invasions. Kashi Vishwanath temple was first destroyed by Qutubdin Aibak. Hindus rebuilt it to be attacked again by Sikander Lodhi. Reconstructed by Raja Man Singh in 1585.
In 1669, Kashi was again attacked by another Islamic invader named Aurangzeb who not only destroyed every temple that came his way but also killed each and every Hindu devotee who tried to save the temples.
These Islamic invaders not only destroyed the temples in Kashi but all over India.Every temple that was destroyed, they raised a Mosque in its place, the proofs of which we are still finding all over. These Mosques remind us about our historical wounds that have still not healed.
It's not that Nehru didn't know about all these facts but the question is that despite knowing the facts, Why he behaved in a certain way that he did, and not only once, many times. Why should India do anything that conforms to Saudi King's beliefs and his country?
And to that matter why should India do anything that any other country wants?
The Irony was that when Nehru requested Saudi King to say, 'fate of Indian Muslim was in safe hand' in his speech. So, Nehru wanted to prove this.
Nehru also visited Saudi Arabia in 1956 to take ahead the diplomatic relations but did Saudi King cover all the Mosques coming in Nehru's way? Definitely not. Saudi Arabia didn't compromise with its culture and traditions and for that Saudi King definitely deserves appreciation.
The problem was with our leader, not the leader of Saudi Arabia.
Nehru has done the politics of appeasement whole his life the negative consequences of which we are still facing. All he cared about was the PM's Chair. He was a power hungry PM who didn't care about India at all.
If he cared, this great Nation would have been still united. He could've easily stopped the partition if he gave up his dream of becoming PM.

See the contrasting images 👇

Continuing the legacy of their Great Grandfather and An Unapologetic Hindu.

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हिमालय पर्वत की एक बड़ी पवित्र गुफा थी।उस गुफा के निकट ही गंगा जी बहती थी।एक बार देवर्षि नारद विचरण करते हुए वहां आ पहुंचे।वह परम पवित्र गुफा नारद जी को अत्यंत सुहावनी लगी।वहां का मनोरम प्राकृतिक दृश्य,पर्वत,नदी और वन देख उनके हृदय में श्रीहरि विष्णु की भक्ति अत्यंत बलवती हो उठी।


और देवर्षि नारद वहीं बैठकर तपस्या में लीन हो गए।इन्द्र नारद की तपस्या से घबरा गए।उन्हें हमेशा की तरह अपना सिंहासन व स्वर्ग खोने का डर सताने लगा।इसलिए इन्द्र ने नारद की तपस्या भंग करने के लिए कामदेव को उनके पास भेज दिया।वहां पहुंच कामदेव ने अपनी माया से वसंतऋतु को उत्पन्न कर दिया।


पेड़ और पौधों पर रंग बिरंगे फूल खिल गए और कोयलें कूकने लगी,पक्षी चहकने लगे।शीतल,मंद,सुगंधित और सुहावनी हवा चलने लगी।रंभा आदि अप्सराएं नाचने लगीं ।किन्तु कामदेव की किसी भी माया का नारद पे कोई प्रभाव नहीं पड़ा।तब कामदेव को डर सताने लगा कि कहीं नारद क्रोध में आकर मुझे श्राप न देदें।

जैसे ही नारद ने अपनी आंखें खोली, उसी क्षण कामदेव ने उनसे क्षमा मांगी।नारद मुनि को तनिक भी क्रोध नहीं आया और उन्होने शीघ्र ही कामदेव को क्षमा कर दिया।कामदेव प्रसन्न होकर वहां से चले गए।कामदेव के चले जाने पर देवर्षि के मन में अहंकार आ गया कि मैने कामदेव को हरा दिया।

नारद फिर कैलाश जा पहुंचे और शिवजी को अपनी विजयगाथा सुनाई।शिव समझ गए कि नारद अहंकारी हो गए हैं और अगर ये बात विष्णु जी जान गए तो नारद के लिए अच्छा नहीं होगा।ये सोचकर शिवजी ने नारद को भगवन विष्णु को ये बात बताने के लीए मना किया। परंतु नारद जी को ये बात उचित नहीं लगी।
🌺कैसे बने गरुड़ भगवान विष्णु के वाहन और क्यों दो भागों में फटी होती है नागों की जिह्वा🌺

महर्षि कश्यप की तेरह पत्नियां थीं।लेकिन विनता व कद्रु नामक अपनी दो पत्नियों से उन्हे विशेष लगाव था।एक दिन महर्षि आनन्दभाव में बैठे थे कि तभी वे दोनों उनके समीप आकर उनके पैर दबाने लगी।


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महर्षि बोले,"शीघ्र ही मैं यज्ञ करूंगा और यज्ञ के उपरांत तुम दोनो की इच्छाएं अवश्य पूर्ण होंगी"।


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परिणामस्वरूप दिन प्रतिदिन कद्रू व विनता के सम्बंधों में कटुता बढ़ती गयी।एकदिन जब दोनो भ्रमण कर रहीं थी तब कद्रू ने दूर खड़े सफेद घोड़े को देख कर कहा,"बता सकती हो विनता!दूर खड़ा वो घोड़ा किस रंग का है?"
विनता बोली,"सफेद रंग का"।
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🌺हम सभी ने ऋषि, मुनि, महर्षि, साधु और संत जैसे शब्द तो सुने ही हैं और हम सोचते हैं कि इन सबका अर्थ एक ही है परन्तु वास्तव में इन सब मे अंतर होता है?🌺

⚜️क्या आपको पता है कि ऋषि, मुनि, महर्षि, साधु और संत जैसे शब्दों में क्या अंतर है?⚜️

आइए देखते हैं:👇


भारत में प्राचीन काल से ही ऋषि-मुनियों का विशेष महत्व रहा है।आज से सैकड़ों साल पहले 'ऋषि', 'मुनि', 'महर्षि' और 'ब्रह्मर्षि' समाज के पथ प्रदर्शक माने जाते थे। तब यही लोग अपने ज्ञान और तप के बल पर समाज कल्याण का कार्य किया करते थे और लोगों को समस्याओं से मुक्ति दिलाते थे।

आज के समय में भी हमें कई तीर्थ स्थलों, मंदिरों, जंगलों और पहाड़ों में साधु-संत देखने को मिल जाते हैं।

♨️ऋषि♨️

ऋषि शब्द की व्युत्पत्ति 'ऋष' है जिसका अर्थ 'देखना' या 'दर्शन शक्ति' होता है।


ऋषि अर्थात "दृष्टा" भारतीय परंपरा में श्रुति ग्रंथों को दर्शन करने (यानि यथावत समझ पाने) वाले जनों को कहा जाता है। वे व्यक्ति विशिष्ट जिन्होंने अपनी विलक्षण एकाग्रता के बल पर गहन ध्यान में विलक्षण शब्दों के दर्शन किये उनके गूढ़ अर्थों को जाना व मानव अथवा..

..प्राणी मात्र के कल्याण के लिये ध्यान में देखे गए शब्दों को लिखकर प्रकट किया। इसीलिये कहा गया -

⚜️“ऋषयो मन्त्र द्रष्टारः
न तु कर्तारः।”⚜️

अर्थात् ऋषि तो मंत्र के देखनेवाले हैं नकि बनानेवाले अर्थात् बनानेवाला तो केवल एक परमात्मा ही है।

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How can we use language supervision to learn better visual representations for robotics?

Introducing Voltron: Language-Driven Representation Learning for Robotics!

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Videos of humans performing everyday tasks (Something-Something-v2, Ego4D) offer a rich and diverse resource for learning representations for robotic manipulation.

Yet, an underused part of these datasets are the rich, natural language annotations accompanying each video. (2/12)

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https://t.co/Pb0mk9hb4i) and R3M (https://t.co/o2Fkc3fP0e).

The secret is *balance* (3/12)

Starting with a masked autoencoder over frames from these video clips, make a choice:

1) Condition on language and improve our ability to reconstruct the scene.

2) Generate language given the visual representation and improve our ability to describe what's happening. (4/12)

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