एक अनियंत्रित, विचलित, अशांत व कामनाओं से युक्त मन को किस प्रकार नियंत्रित करें?

इसका एक सर्वश्रेष्ठ उपाय श्रीमदभगवदगीता का नियमित पाठ करना ही मन को शांति प्रदान करने में निस्संदेह सक्षम है।

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श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण जी ने युद्ध व धर्म के मध्य कुरुक्षेत्र में अर्जुन को ईश्वरीय दिव्य ज्ञान का उपदेश दिया, ये ज्ञान सृष्टि का सर्वोत्तम, सर्वप्रिय व श्रेष्ठ ज्ञान है। जिसे अर्जुन ने प्राप्त किया।

गीता ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति का एकमात्र पर्याप्त ग्रंथ है।
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्। कार्यते ह्यश: कर्म सर्व प्रकृतिजैर्गुणै:।। 

कोई भी प्राणी कर्म किये बिना जीवित नही रह सकता, जब तक वह इस धरती पर रहता है वह कर्मो के बंधन के आधीन है। और प्रकृति के नियमों से बंधा हुआ है।
प्रकृति के आधीन कर्मो के बंधन से प्राणी कर्म किये बिना नही रह सकता, उसे कोई न कोई कर्म स्वतः ही करना पड़ता है।

अर्थात कोई भी प्राणी क्षण भर भी कर्मो से परे नही रह सकता है।
अवगुण का त्याग...

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तरमादेतत्त्रयं त्यजेत्।। 

काम, क्रोध व लोभ के आवेश में प्राणी अपने जीवन को समाप्ति की ओर ले जाता है, मुक्ति के द्वार को प्राणी इन कामनाओं के आवेश में स्वतः ही समाप्त कर देता है।
इसी प्रकार जीवन में काम, क्रोध, लोभ, मोह, माया, अवगुण आदि को त्यागकर ही मनुष्य श्रेष्ठता को प्राप्त करने में सक्षम बन सकता है।

इन अवगुणों के आधार पर मनुष्य अपने जीवन में कभी शांत नही रह सकता, न ही कभी क्रोध के आवेग को समाप्त कर सकता है।
इंद्रियों पर नियंत्रण

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः  वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।। 

श्रीकृष्ण, अर्जुन से अपने उपदेश में कहते है कि मनुष्य को आवश्यक है कि वह अपनी समस्त इंद्रियों को अपने नियंत्रण में करें जिससे वह अपनी बुद्धि को स्थिर कर सकता है....
मनुष्य जब तक इंद्रियों को अपने नियंत्रण के आधीन नही करेगा तब तक उसका मन चंचलता से युक्त रहेगा, बुद्धि में अस्थिरता बनी रहेगी, मन विचलित रहेगा। मन कभी शांत नही होगा।

मन में अनेकों विचारों का आवागमन बना रहेगा।
इच्छा व कामनाओं पर नियंत्रण...

विहाय कामान् य: कर्वान्पुमांश्चरति निस्पृह:।  निर्ममो निरहंकार स शांतिमधिगच्छति।।

जब तक मनुष्य इच्छा व कामनाओं का त्याग नही करता, उसका चंचल मन अशांत रहता है, उसे शीतलता प्राप्त नही होती, अस्थिरता बनी रहती है, बुद्धि का विवेक भी शून्य होता है।
इच्छा व कामना के अधीन रहकर मनुष्य सदैव अशांत रहता है, जब वह कोई कर्म करता है तो परिणाम की इच्छा को अपने मन में धारण कर लेता है जिससे वह उस इच्छा के कारण मन को शांत रहने नही देता, मन में अनंत कामनाओं का समावेश धारित किये रखता है।

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