दधीचि ऋषि को मनाही थी कि वह अश्विनी कुमारों को किसी भी अवस्था में ब्रह्मविद्या का उपदेश नहीं दें। ये आदेश देवराज इन्द्र का था।वह नहीं चाहते थे कि उनके सिंहासन को प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से कोई भी खतरा हो।मगर जब अश्विनी कुमारों ने सहृदय प्रार्थना की तो महर्षि सहर्ष मान गए।
एक बार देवराज इन्द्र अपनी सभा में बैठे थे, तो उन्हे खुद पर अभिमान हो आया।
असुरों को जब ये ज्ञात हुआ तो उन्होने तुरंत अपने गुरु शुक्राचार्या...
ऋषि दधीचि बोले,"देवराज!समस्त देह धारियों को अपनी देह प्यारी होती है।स्वेच्छा से देह त्याग करना कठिन कार्य होता है।