आज के व्याख्यान में धर्मांतरण का वो मर्म जाना जो शायद हमें कभी पता ही नही चलता, अगर हमने इन विद्वान जन को ना सुना होता जैसे की धर्मांतरण सिर्फ धर्म परिवर्तन करना नही होता अपितु राष्ट्र के प्रति अपनी निष्ठा को भी परिवर्तन करना होता है।

क्या कारण है कि हम हिंदू धर्मांतरण करते हैं अपितु कोई भी संप्रदाय हिंदू धर्म में परिवर्तित नहीं होता क्या कमज़ोरियां हैं हमारी जो हम इस दल दल में सहर्ष ही गिरना चाहते हैं !!
क्या हमारे निजी हित और जरूरतें इतनी अहम हैं की हम अपना धर्म अपना स्वाभिमान अपनी पहचान और सर्वोपरि राष्ट्र की सुरक्षा की भी अनदेखी कर देते हैं !!
क्या आज हम समझ पाते हैं गंभीरता कि हम अगर अपने धर्म को नहीं जानेंगे ना ही अध्ययन करेंगे तो इसके क्या दुष्परिणाम होंगे, कैसे हमारी भावी पीढ़ी को हमारी खामी भुगतनी पड़ेगी, क्यों हम ईश्वर को मानने वाले सनातनी, दूसरे धर्म के चमत्कार के झूठे प्रपंच में फंस जाते हैं !!
हमने जाना कि धर्मांतरण का जो वृक्ष हम देख रहे हैं आज के संदर्भ में, उसकी जड़ें इतिहास के किन अध्यायों में दर्ज है क्या वास्तव में जिन विदेशियों का हम महिमंडन करते हैं इतिहास की पुस्तकों में, वो सचमुच महान थे !!
क्योंकि आज का व्याख्यान #स्वामी_विवेकानंद जी की जयंती के पूर्व संध्या पर रखा गया और स्वामी जी ही प्रेरणा रहे इस समग्र व्याख्यान की, यहां तक कि हमारे वक्ता अतिथियों द्वारा दी गई जानकारी भी स्वामी जी के विचारों पर ही आधारित थी, स्वामी जी का धर्मांतरण को लेकर चिंता और चिंतन..
दोनों ही हमारे लिए जानने योग्य हैं जब स्वामी जी कहते हैं कि अगर देश का एक हिंदू धर्म परिवर्तन करता है तो देश का एक हिंदू ही कम नही होता बल्कि देश का एक शत्रु बढ़ जाता है, और ये भी कि अगर हम अपने सनातन अध्यात्म को नहीं जानते तो हम हिंदू हो भी नही सकते..
जो लिखा ये तो सिर्फ उस ज्ञान गंगा की कुछ छींटे मात्र हैं क्योंकि मुझमें वो काबिलियत ही नही की मैं इतने बड़े ज्ञानी जन के वक्तव्यों पर टिप्पणी कर सकूं, पर क्योंकि मैं बहुत विस्मित हूं उत्साहित हूं तो इस लिए कुछ लिखने की गुस्ताखी की, आशा करती हूं की आप त्रुटियों को अनदेखा करेंगे 🙏

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राम-रावण युद्ध समाप्त हो चुका था। जगत को त्रास देने वाला रावण अपने कुटुम्ब सहित नष्ट हो चुका था।श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ और अयोध्या नरेश श्री राम के नेतृत्व में चारों दिशाओं में शन्ति थी।
अंगद को विदा करते समय राम रो पड़े थे ।हनुमान को विदा करने की शक्ति तो राम में थी ही नहीं ।


माता सीता भी हनुमान को पुत्रवत मानती थी। अत: हनुमान अयोध्या में ही रह गए ।राम दिनभर दरबार में, शासन व्यवस्था में व्यस्त रहते थे। संध्या को जब शासकीय कार्यों में छूट मिलती तो गुरु और माताओं का कुशल-मंगल पूछ अपने कक्ष में जाते थे। परंतु हनुमान जी हमेशा उनके पीछे-पीछे ही रहते थे ।


उनकी उपस्थिति में ही सारा परिवार बहुत देर तक जी भर बातें करता ।फिर भरत को ध्यान आया कि भैया-भाभी को भी एकांत मिलना चाहिए ।उर्मिला को देख भी उनके मन में हूक उठती थी कि इस पतिव्रता को भी अपने पति का सानिध्य चाहिए ।

एक दिन भरत ने हनुमान जी से कहा,"हे पवनपुत्र! सीता भाभी को राम भैया के साथ एकांत में रहने का भी अधिकार प्राप्त है ।क्या आपको उनके माथे पर सिन्दूर नहीं दिखता?इसलिए संध्या पश्चात आप राम भैया को कृप्या अकेला छोड़ दिया करें "।
ये सुनकर हनुमान आश्चर्यचकित रह गए और सीता माता के पास गए ।


माता से हनुमान ने पूछा,"माता आप अपने माथे पर सिन्दूर क्यों लगाती हैं।" यह सुनकर सीता माता बोलीं,"स्त्री अपने माथे पर सिन्दूर लगाती है तो उसके पति की आयु में वृद्धि होती है और वह स्वस्थ रहते हैं "। फिर हनुमान जी प्रभु राम के पास गए ।