Authors Vibhu Vashisth

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ARE WE FAMILIAR WITH THE MEANING & POWER OF MANTRAS WE CHANT?

Whenever we chant a Mantra in Sanskrit, it starts with 'Om' and mostly ends with 'Swaha' or 'Namaha'. This specific alignment of words has a specific meaning to it which is explained in Dharma Shastra.


Mantra is a Sanskrit word meaning sacred syllable or sacred word. But Mantras r not just words put together,they r also vibrations.The whole Universe is a cosmic energy in different states of vibration &this energy in different states of vibration forms the objects of Universe.

According to Scriptures,Om is considered to be ekaakshar Brahman,which means Om is the ruler of 3 properties of creator,preserver&destroyer which make the
https://t.co/lyhkWeCdtv is also seen as a symbol of Lord Ganesha, as when starting the prayer,it's him who is worshipped 1st.


'Om' is the sound of the Universe. It's the first original vibration of the nothingness through which manifested the whole Cosmos. It represents the birth, death and rebirth process. Chanting 'Om' brings us into harmonic resonance with the Universe. It is a scientific fact.

Therefore, Mantras are described as vibrational words that are recited, spoken or sung and are invoked towards attaining some very specific results. They make very specific sounds at a frequency that conveys a directive into our subconcious.
THE MEANING, SIGNIFICANCE AND HISTORY OF SWASTIK

The Swastik is a geometrical figure and an ancient religious icon. Swastik has been Sanatan Dharma’s symbol of auspiciousness – mangalya since time immemorial.


The name swastika comes from Sanskrit (Devanagari: स्वस्तिक, pronounced: swastik) &denotes “conducive to wellbeing or auspicious”.
The word Swastik has a definite etymological origin in Sanskrit. It is derived from the roots su – meaning “well or auspicious” & as meaning “being”.


"सु अस्ति येन तत स्वस्तिकं"
Swastik is de symbol through which everything auspicios occurs

Scholars believe word’s origin in Vedas,known as Swasti mantra;

"🕉स्वस्ति ना इन्द्रो वृधश्रवाहा
स्वस्ति ना पूषा विश्ववेदाहा
स्वस्तिनास्तरक्ष्यो अरिश्तनेमिही
स्वस्तिनो बृहस्पतिर्दधातु"


It translates to," O famed Indra, redeem us. O Pusha, the beholder of all knowledge, redeem us. Redeem us O Garudji, of limitless speed and O Bruhaspati, redeem us".

SWASTIK’s COSMIC ORIGIN

The Swastika represents the living creation in the whole Cosmos.


Hindu astronomers divide the ecliptic circle of cosmos in 27 divisions called
https://t.co/sLeuV1R2eQ this manner a cross forms in 4 directions in the celestial sky. At centre of this cross is Dhruva(Polestar). In a line from Dhruva, the stars known as Saptarishi can be observed.
🌺जब गणेश जी की क्षुधा शान्त न कर पाए धन कुबेर🌺

सनातन धर्म में धन, सुख और समृद्धि के देवता कुबेर माने गए हैं ।एक बार कुबेर जी को इसी बात का अभिमान हो आया कि उनका इस संसार में कितना महत्व है। उनके बिना तो कोई भी व्यक्ति धन,सुख और समृद्धि को नहीं पा सकता।


कुबेर को इसबात का घमंड होगया कि उनमें इतनी क्षमता है कि वो सभी का भरण पोषण कर सकते हैं।उनके धन वैभव से वो किसी को भी तृप्त कर सकते हैं।अब कुबेर सभी देवी देवताओं के पास जाकर स्वयं ही अपना गुणगान करने लगे व ये सोचने लगे कि वे ऐसा क्या करें कि तीनों लोकों में उनकी और भी जय जयकार हो।


एकदिन अभिमान में चूर कुबेर जी कि मुलाकात देवर्षि नारद से होती है।नारद जी के सामने भी कुबेर अपना बखान और गुणगान करना शुरु कर देते हैं और उनसे ये पूछते हैं कि उन्हें और क्या करना चाहिये जिससे कि उनके वर्चस्व में चार चाँद लग जाएं। नारद जी उनकी बातों में छुपे अहंकार को भांप लेते हैं।


तब देवर्षि उन्हें कुछ ऐसा करने को कहते हैं जिससे कुबेर जी का अहंकार चूर हो जाए।नारद कुबेर को कहते हैं,"हे कुबेर!आपको अपने वर्चस्व में चार चाँद लगाने के लिए एक भव्य भोज का आयोजन करना चाहिए व उस भोज में संसार के सभी जीवों,सभी देवी-देवता,नाग,गन्धर्व,यक्ष आदि को आमंत्रित करना चाहिए।

इनके अलावा आप त्रिदेवों ब्रह्मा,विष्णु और महेश को भी सपरिवार आमंत्रित करें।ऐसे भव्य भोज का आयोजन करने से चारों दिशाओं और तीनों लोकों में आपके धन-वैभव और समृद्धि की जय-जयकार होगी।" कुबेर देवर्षि कि ये बात सुन बहुत ही खुश होते हैं और भव्य-भोज की तैयारी शुरु कर देते हैं ।
एक बार भगवान कृष्ण की पत्नी महारानी सत्यभामा को अपनी सुन्दरता का अभिमान हो चला।दरबार में सिंहासन पर बैठे महारानी सत्यभामा ने श्री कृष्ण से अनायास ही पूछ लिया,"स्वामी!आपने त्रेता युग में भगवान राम के रूप में अवतार लिया था तथा सीता आपकी पत्नी थीं।क्या वह मुझसे भी ज्यादा सुन्दर थी?"


श्री कृष्ण सत्यभामा के प्रश्न का उत्तर देते कि उससे पहले ही गरुड़ बोल पड़े,"प्रभु!क्या मुझसे भी ज्यादा तीव्र गति से कोई इस सम्पूर्ण जग में उड़ सकता है।"
ये सुन सुदर्शन से भी नहीं रहा गया और वह भी बोल पड़ा,"भगवन!मैनें बड़े-बड़े युद्धों में आपको विजयश्री दिलवाई है।


क्या संसार में मुझसे भी बड़ा कोई शक्तिशाली है।" तीनों की ये बातें सुन श्री कृष्ण मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे और जान रहे थे कि इन सबमें अहंकार आ गया है जिसे नष्ट करना अति आवश्यक है।तब श्री कृष्ण ने उन तीनो से कहा,"मेरा एक परम भक्त है, हनुमान।तुम तीनों के प्रश्नों के उत्तर वही...


...भलीभांति दे पाएगा। हे गरुड़! तुम तो बड़ी तीव्र गति से उड़ते हो।तुम जाओ और हनुमान को ये कहकर बुला लाओ कि भगवान राम , माता सीता के साथ उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। प्रभु राम और माता सीता का नाम सुनकर वे दौड़े-दौड़े चले आएंगे।" गरुड़ भगवान की आज्ञा लेकर हनुमानजी को बुलाने उड़ चले।

इधर श्री कृष्ण ने सत्यभामा से कहा कि देवी आप सीता के रूप में तैयार हो जाएं और स्वयं द्वारकाधीश ने श्री राम का रूप धारण कर लिया।फिर श्री कृष्ण ने सुदर्शन को आज्ञा देते हुए कहा कि तुम महल के प्रवेशद्वार पर पहरा दो।ज्ञात रहे कि मेरी आज्ञा के बिना कोई भी महल में प्रवेश न करने पाए ।
🌺हनुमान जी ने क्यों धारण किया था पंचमुखी रूप, कैसे हुआ था अहिरावण वध और कौन था मकरध्वज?🌺

श्रीराम और रावण का भीषण युध्द चल रहा था। एक-एक कर रावण के सभी शक्तिशाली योध्दा मारे जा रहे थे।जब रावण का बलशाली एवं पराक्रमी पुत्र मेघनाद भी मारा गया तब रावण गहन चिंता व शोक में डूब गया।


अब उसके पास कोई भी पराक्रमी योद्धा शेष नहीं बचा था। ऐसे में उसे अपने भाई अहिरावण की याद आयी जो पाताल-लोक का राजा था। रावण ने अहिरावण को अपनी सहायता हेतु तुरंत बुलावा भेजा।

विभीषण को शीघ्र ही अपने गुप्तचरों द्वारा इस बात का पता लग गया। विभीषण जानता था की अहिरावण अत्यंत पराक्रमी एवं मायावी राक्षस है, इसलिए उसे श्रीराम और लक्ष्मण की सुरक्षा की चिंता सताने लगी।


जब विभीषण ने हनुमान जी के सामने अपनी चिंता व्यक्त की तो हनुमान जी ने स्वयं श्रीराम और लक्ष्मण जी की सुरक्षा का दायित्व संभाला।
उधर लंकेश के बुलावे की आज्ञा का पालन करते हुए अहिरावण लंका पहुंच चुका था।
रावण ने तब अहिरावण को श्रीराम और लक्ष्मण का वध करने के...


...लिए भेज दिया।
प्रभु राम और लक्ष्मण अपनी कुटिया में सो रहे थे और हनुमान जी बाहर पहरा दे रहे थे। हनुमान जी ने कुटिया के चारों ओर सुरक्षा का अभेद्य घेराव बना दिया था जिसके अन्दर किसी मायावी शक्ति का प्रवेश करना असंभव था।
अहिरावण कुटिया के बाहर तक तो पहुंच गया परंतु मायावी...
महाभारत की कहानी कौन नहीं जानता।लेकिन क्या आपको पता है कि महाभारत के ज्यादातर पात्र किसी न किसी श्राप में फंसे थे।अगर ये श्राप न होते तो कदाचित महाभारत की कहानी कुछ और होती।हिन्दु पौराणिक ग्रंथों में विभिन्न श्रापों का वर्णन मिलता है व हर श्राप के पीछे कोई कहानी अवश्य होती है।


आइए आज जानते हैं महाभारत कथा में वर्णित कुछ श्रापों के बारे में।

1) राजा पाण्डु को ऋषि किन्दम का श्राप

एकबार महाराज पाण्डु शिकार खेलने वन गए।झाडियों के पीछे कुछ हिल रहा था। मृग है सोचकर राजा ने बाण चलाया जो जाकर ऋषि किन्दम और उनकी पत्नी को लगा।वे दोनो रति-क्रीड़ा में लिप्त थे।

जब राजा ने उन्हें देखा तो बहुत दुखी हुए कि ये मुझसे क्या पाप हो गया।बहुत क्षमा याचना के बाद भी किन्दम ऋषि ने पाण्डु को श्राप दे दिया कि जब भी वो किसी स्त्री को काम भावना से स्पर्श करेंगे उसी क्षण उनकी मृत्यु हो जाएगी।पश्चाताप करने, वे सिंहासन पे अन्धे राजा धृतराष्ट्र को बैठाकर...


..स्वयं अपनी रानियों कुंती व माद्री के साथ वन चले गए।पांडवों का जन्म भी कुंती को ऋषि दुर्वासा द्वारा दिए गए मंत्र से हुआ था जिसमे किसी भी देव का स्मरण कर उस देव से कुंती,पुत्र प्राप्त कर सकती थी।एक बार माद्री पे मोहित हो जब पांडु ने उसे स्पर्श किया,उसी क्षण पांडु की मृत्यु होगयी।


2) उर्वशी का अर्जुन को श्राप

महाभारत युद्ध से पहले जब अर्जुन दिव्यास्त्र प्राप्त करने स्वर्ग गए तो वहां उर्वशी नाम की अप्सरा उन पर मोहित हो गयी। अर्जुन ने जब उन्हें अपनी माता के समान बताया तो यह सुनकर उर्वशी क्रोधित हो गयी और अर्जुन को श्राप दे डाला कि तुम नपुंसक की भांति...
प्रस्तुत प्रसंग रामायण के सुंदरकांड में से लिया गया है जिसमें बहुत ही सरल तरीके से हनुमान जी की अन्तर्मन की भावनाओं से ये समझाया गया है कि ईश्वर की इच्छा बिना संसार में कुछ भी होना संभव नहीं।
अत: जो हुआ, जो हो रहा है और जो होगा, सब प्रभु की इच्छा से होगा।


अशोक वाटिका में जिस समय रावण क्रोध से भरकर, तलवार लेकर, सीता माता को मारने के लिए दौड़ पड़ा , तब हनुमान जी को लगा कि इसकी तलवार छीनकर, इसका सिर काट लेना चाहिए।


किन्तु अगले ही क्षण उन्होंने देखा कि मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़ लिया। ये देखकर वे गदगद हो उठे और ये सोचने लगे कि यदि मैं आगे बढ़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि यदि मैं न होता तो सीता जी को कौन बचाता?
बहुत बार हमको ऐसा ही भ्रम हो जाता है,
मैं न होता, तो क्या होता ?

परंतु ये क्या हुआ?
सीताजी को बचाने का कार्य प्रभु ने स्वयं रावण की पत्नी को ही सौंप दिया। तब हनुमान जी समझ गए कि प्रभु जिससे जो काम लेना चाहते हैं, वह उसीसे लेते हैं। कोई और चाहकर भी वह काम नहीं कर सकता।

आगे चलकर जब त्रिजटा ने कहा कि लंका में बन्दर आया हुआ है और वह लंका जलाएगा।


तो हनुमान जी बड़ी चिंता में पड़ गए कि प्रभु राम ने तो लंका जलाने को कहा ही नहीं है और त्रिजटा कह रही है कि उन्होने स्वप्न में देखा है कि एक वानर ने लंका जलाई है। अब उन्हें क्या करना चाहिये। फिर उन्होने सोचा,'जो प्रभु कि इच्छा।'
कौरव और पांडवों के बीच जब राज्य बंटवारे को लेकर कलह चली, तो मामा शकुनि की अनुशंसा पर धृतराष्ट्र ने खांडवप्रस्थ नामक एक जंगल को देकर पांडवों को कुछ समय तक के लिए शांत कर दिया था। इस जंगल में एक महल था जो खंडहर हो चुका था। पांडवों के समक्ष अब उस जंगल को एक नगर बनाने की चुनौती थी।


खंडहर महल के चारों तरफ भयानक जंगल था। यमुना नदी के किनारे एक बीहड़ वन था जिसका नाम खांडव वन था। पहले इस जंगल में एक नगर हुआ करता था,फिर वह नगर नष्ट हो गया और उसके खंडहर ही बचे थे।खंडहरों के आसपास वहां जंगल निर्मित हो गया था।यहां इंद्रप्रस्थ नगर बसाने के लिए इस जंगल में...


...अर्जुन और श्रीकृष्ण ने आग लगा दी थी।
खांडववन में अग्नि धधकने लगी और उसकी ऊंची ऊंची लपटे आकाश तक पहुंच गई।खांडववन को अग्नि 15 दिन तक जलाती रही।इस अग्निकाण्ड में केवल छह प्राणी ही बच पाते हैं।अश्‍वसेन सर्प, मयदानव(मयासुर)और चार शार्ड्ग पक्षी। आओ जानते हैं कि अश्वसेन सर्प कौन था।


अश्वसेन तक्षक नाग का पुत्र था। खांडववन जल रहा था तब उसकी माता ने उसे अपने मुंह में निगल लिया और वहां से भाग गई।परंतु असहनीय गर्मी के कारण वह बच न सकी। लेकिन अपनी जान दे कर भी वह नागिन अपने मुंह में छुपाए अपने बच्चे को जीवन-दान दे गयी।


अश्वसेन की माता तो मार गयी परंतु अश्वसेन बच गया। उसे अपनी माँ की इस प्रकार मृत्यु का बड़ा दुख हुआ और वो प्रतिशोध की अग्नि में जलने लगा।तत्पश्चात उसका एक ही लक्ष्य था की जिस अर्जुन ने खांडव वन में आग लगाकर उसकी माता के प्राण लिए, वह किस प्रकार उसके प्राण ले।