Authors Vibhu Vashisth

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Do you know?

In the Hindu way of life, this prayer is adopted while sitting on the bed at the time of waking up in the morning:

कराग्रे वसते लक्ष्मिः करमध्ये सरस्वति।
करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम् ॥
🌺🌺🌺

And how many Hindus really follow this ?


The meaning is very simple: knowledge, power and wealth depend on the work with your hand.

कराग्रे = in the front of the hand i.e. fingers; वसते = lives;

लक्ष्मी = the divinity of prosperity (material and spiritual) [from the word lakShya = goal];

कर-मध्ये सरस्वती = in the middle of the palm; lives the divinity of learning, knowledge;

कर-मूले तू गोविंद: = in the wrist lives the universal guide of righteousness - Krishna.

प्रभाते कर दर्शनम = Every morning ones should looked at all these divine personalities...

...so that with them in your hand thus; you will enlightened day ahead.

For making us sit for some more time the second part of the prayer is added:

समुद्र वसने देवी पर्वत: स्थाना मंडले,
विष्णु पत्नी: नमस्तुभ्यम,
पादा स्पर्शम क्षमास्वमे।।🌺

The meaning is very simple: Oh ! Mother earth, where the mountains are part of your body and you are the wife of Prabhu Mahavishnu, May I perform my pranam to you?
🌺श्री कृष्ण और स्यांतक मणी की कहानी🌺

एक बार भगवान श्रीकृष्ण बलरामजी के साथ हस्तिनापुर गए। उनके हस्तिनापुर चले जाने के बाद अक्रूर और कृतवर्मा ने शतधन्वा को स्यमंतक मणि छीनने के लिए उकसाया। शतधन्वा बड़े दुष्ट और पापी स्वभाव का मनुष्य था।


अक्रूर और कृतवर्मा के बहकाने पर उसने लोभवश सोए हुए सत्राजित को मौत के घाट उतार दिया और मणि लेकर वहाँ से चला गया। शतधन्वा द्वारा अपने पिता के मारे जाने का समाचार सुनकर सत्यभामा शोकातुर होकर रोने लगी।

फिर भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण कर उसने यह प्रतिज्ञा की कि जब तक श्रीकृष्ण शतधन्वा का वध नहीं कर देंगे, वह अपने पिता का दाह-संस्कार नहीं होने देगी। इसके बाद उसने हस्तिनापुर जाकर श्रीकृष्ण को सारी घटना से अवगत कराया।वे उसी समय सत्यभामा और बलरामजी के साथ हस्तिनापुर से द्वारिका लौट आए।

द्वारिका पहुँचकर उन्होंने शतधन्वा को बंदी बनाने का आदेश दे दिया। जब शतधन्वा को ज्ञात हुआ कि श्रीकृष्ण ने उसे बंदी बनाने का आदेश दे दिया है तो वह भयभीत होकर कृतवर्मा और अक्रूर के पास गया और उनसे सहायता की प्रार्थना की। किंतु उन्होंने सहायता करने से इंकार कर दिया।

तब उसने स्यमंतक मणि अक्रूर को सौंप दी और अश्व पर सवार होकर द्वारिका से भाग निकला।
श्रीकृष्ण व बलराम को उसके भागने की सूचना मिली।अतः उसका वध करने के लिए वे रथ पर सवार होकर उसका पीछा करने लगे।उन्हें पीछे आते देख शतधन्वा भयभीत होकर अश्व से कूद गया व पैदल ही वन की ओर दौड़ने लगा।
झूला देवी मंदिर, चौबातिया रानीखेत🚩

झूला देवी मंदिर रानीखेत शहर से 7 किमी की दुरी पर स्थित एक लोकप्रिय पवित्र एवम् धार्मिक मंदिर है |यह मंदिर माँ दुर्गा को समर्पित है एवम् इस मंदिर को झूला देवी के रूप में नामित किया गया है | स्थानीय लोगों के अनुसार यह मंदिर 700 वर्ष पुराना है |


रानीखेत में स्थित झूला देवी मंदिर पहाड़ी स्टेशन पर एक आकर्षण का स्थान है |यह भारत के उत्तराखंड राज्य में अल्मोड़ा जिले के चैबटिया गार्डन के निकट रानीखेत से 7 किमी की दूरी पर स्थित है।वर्तमान मंदिर परिसर 1935 में बनाया गया है|झूला देवी मंदिर के समीप ही भगवान राम का मंदिर भी है ।


झूला देवी मंदिर को घंटियों वाला मंदिर के रूप में भी जाना जाता है | हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार इस मंदिर का निर्माण क्षेत्र में रहने वाले जंगली जानवरों द्वारा उत्पीड़न से मुक्त कराने के लिए मां दुर्गा की कृपा बनाये रखने के उद्देश्य से किया गया था ।


मंदिर परिसर में झूला स्थापित होने के कारण देवी को “झूला देवी” नाम से पूजा जाता है |

मां के झूला झूलने के बारे में एक और कथा प्रचलित है। माना जाता है कि एक बार श्रावण मास में माता ने किसी व्यक्ति को स्वप्न में दर्शन देकर झूला झूलने की इच्छा जताई।


ग्रामीणों ने मां के लिए एक झूला तैयार कर उसमें प्रतिमा स्थापित कर दी।
उसी दिन से यहां देवी मां “झूला देवी” के नाम से पूजी जाने लगी।

यह कहा जाता है कि मंदिर लगभग 700 वर्ष पुराना है । चैबटिया क्षेत्र जंगली जानवर से भरा घना जंगल था ।