Authors Vibhu Vashisth

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🌺श्री कृष्ण और स्यांतक मणी की कहानी🌺

एक बार भगवान श्रीकृष्ण बलरामजी के साथ हस्तिनापुर गए। उनके हस्तिनापुर चले जाने के बाद अक्रूर और कृतवर्मा ने शतधन्वा को स्यमंतक मणि छीनने के लिए उकसाया। शतधन्वा बड़े दुष्ट और पापी स्वभाव का मनुष्य था।


अक्रूर और कृतवर्मा के बहकाने पर उसने लोभवश सोए हुए सत्राजित को मौत के घाट उतार दिया और मणि लेकर वहाँ से चला गया। शतधन्वा द्वारा अपने पिता के मारे जाने का समाचार सुनकर सत्यभामा शोकातुर होकर रोने लगी।

फिर भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण कर उसने यह प्रतिज्ञा की कि जब तक श्रीकृष्ण शतधन्वा का वध नहीं कर देंगे, वह अपने पिता का दाह-संस्कार नहीं होने देगी। इसके बाद उसने हस्तिनापुर जाकर श्रीकृष्ण को सारी घटना से अवगत कराया।वे उसी समय सत्यभामा और बलरामजी के साथ हस्तिनापुर से द्वारिका लौट आए।

द्वारिका पहुँचकर उन्होंने शतधन्वा को बंदी बनाने का आदेश दे दिया। जब शतधन्वा को ज्ञात हुआ कि श्रीकृष्ण ने उसे बंदी बनाने का आदेश दे दिया है तो वह भयभीत होकर कृतवर्मा और अक्रूर के पास गया और उनसे सहायता की प्रार्थना की। किंतु उन्होंने सहायता करने से इंकार कर दिया।

तब उसने स्यमंतक मणि अक्रूर को सौंप दी और अश्व पर सवार होकर द्वारिका से भाग निकला।
श्रीकृष्ण व बलराम को उसके भागने की सूचना मिली।अतः उसका वध करने के लिए वे रथ पर सवार होकर उसका पीछा करने लगे।उन्हें पीछे आते देख शतधन्वा भयभीत होकर अश्व से कूद गया व पैदल ही वन की ओर दौड़ने लगा।
क्या यह आधुनिक तकनीकों वाला युग नींव खोदे बिना एक गगनचुंबी इमारत के निर्माण की कल्पना कर सकता है ?

यह तमिलनाडु का बृहदेश्वर मंदिर है, यह बिना नींव का मंदिर है । इसे इंटरलॉकिंग विधि का उपयोग करके बनाया गया है इसके निर्माण में पत्थरों के बीच कोई सीमेंट,..


..प्लास्टर या किसी भी तरह के चिपकने वाले पदार्थों का प्रयोग नहीं किया गया है इसके बावजूद पिछले 1000 वर्षों में 6 बड़े भूकंपो को झेलकर भी आज अपने मूल स्वरूप में है ।

216 फीट ऊंचा यह मंदिर उस समय दुनिया का सबसे ऊंचा मंदिर था।


इसके निर्माण के कई वर्षों बाद बनी पीसा की मीनार खराब इंजीनियरिंग की वजह से समय के साथ झुक रही है लेकिन बृहदेश्वर मंदिर पीसा की मीनार से भी प्राचीन होने के बाद भी अपने अक्ष पर एक भी अंश का झुकाव नहीं रखता।


इस मंदिर के निर्माण के लिए 1.3 लाख टन ग्रेनाइट का उपयोग किया गया था जिसे 60 किलोमीटर दूर से 3000 हाथियों द्वारा ले जाया गया था। इस मंदिर का निर्माण पृथ्वी को खोदे बिना किया गया था यानी यह मंदिर बिना नींव का मंदिर है ।


मंदिर टॉवर के शीर्ष पर स्थित शिखर का वजन 81 टन है आज के समय में इतनी ऊंचाई पर 81 टन वजनी पत्थर को उठाने के लिए आधुनिक मशीनें फेल हो जाएंगी ।
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आपस में लड़ना छोड़ो और ये पढ़ो

🌎जो हिन्दू इस घमंड मे जी रहे है कि अरबों सालों से सनातन धर्म है और इसे कोई नहीं मिटा सकता,.

..मैं उनसे केवल इतना विनम्र अनुरोध करता हूँ कि नीचे लिखे तथ्यों को एक बार ध्यान से अवश्य पढ़ें:

🌍आखिर अफ़ग़ानिस्तान से हिन्दु क्यों मिट गया?

🌎"काबुल" जो भगवान राम के पुत्र कुश का बनाया शहर था, आज वहाँ एक भी मंदिर नहीं बचा।

🌎"गांधार" जिसका विवरण महाभारत में है, जहां की रानी गांधारी थी, आज उसका नाम कंधार हो चुका है, और वहाँ आज एक भी हिन्दू नहीं बचा l

🌎"कम्बोडिया" जहां राजा सूर्य देव बर्मन ने दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर "अंकोरवाट" बनाया, आज वहाँ भी हिन्दू नहीं है l

🌎"बाली द्वीप" में 20 साल पहले तक 90% हिन्दू थे,आज सिर्फ 20% बचे हैं l

🌎"कश्मीर घाटी" में सिर्फ 25 साल पहले 50% हिंदू थे,आज एक भी हिन्दू नहीं बचाl

🌎"केरल" में 10 साल पहले तक 60% जनसंख्या हिन्दुओं की थी, आज सिर्फ 10% हिन्दू केरल में हैं l

🌎"नोर्थ ईस्ट" जैसे सिक्किम, नागालैंड, आसाम आदि में हिन्दू हर रोज मारे या भगाए जाते हैं, या उनका धर्म परिवर्तन हो रहा है l
🌺एक संक्षिप्त,सुन्दर एवं सार्थक कथा🌺

बहुत पुरानी बात है,किसी कल्प में पृथ्वी के एक नगर में एक जुआरी रहता था।वो स्वभाव से ही नास्तिक था तथा वेदों व शास्त्रों की निंदा करता था।एक दिन उसने जुए में बहुत सारा धन जीत लिया था।


धन के मद में चूर वो उस रात पान, फूल,सुगंध लेकर नगर की सबसे महंगी और खूबसूरत वैश्या के पास जा रहा था। एक उजाड़ मार्ग पे उसे ठोकर लगी, उसका सिर एक पत्थर से टकरा गया और वो मूर्च्छित हो गया।

उस स्थान पर शिवलिंग था। मूर्छित होने पर उसके हाथ के फूल,सुगंध शिवलिंग पर अनजाने तरीके से अर्पित हो गए।वहीं पर उस जुआरी की मौत हो गई। मौत के बाद यमराज के दूत आये और उसे पाश में जकड़ कर यमपुर ले गए।


वहां चित्रगुप्त ने उसके कर्मों का लेखा-जोखा देखकर कहा कि इसने तो पाप ही पाप किए हैं,लेकिन मरते समय इसने जुए के पैसे से वेश्या के लिए खरीदे पुष्प,गंध अनजाने रूप से ‘शिवार्पण’ कर दिए।ये ही एकमात्र इसका पुण्य है। चित्रगुप्त की बात सुनकर यमराज ने उससे पूछा कि हे पापी,तू ही बता कि...


...पहले पाप का फल भोगेगा या पुण्य का।
जुआरी बोला की पाप के तो बहुत फल भोगने पड़ेंगे, पहले पुण्य का ही फल भोग लूं। तो उस एक पुण्य के बदले उसे दो घड़ी के लिए इन्द्र बनाया गया।
यमराज स्वर्ग पहुंचे और उन्होने दो घड़ी के लिए अपने पद से इन्द्र को त्यागपत्र देने को कहा।