Authors Vibhu Vashisth

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झूला देवी मंदिर, चौबातिया रानीखेत🚩

झूला देवी मंदिर रानीखेत शहर से 7 किमी की दुरी पर स्थित एक लोकप्रिय पवित्र एवम् धार्मिक मंदिर है |यह मंदिर माँ दुर्गा को समर्पित है एवम् इस मंदिर को झूला देवी के रूप में नामित किया गया है | स्थानीय लोगों के अनुसार यह मंदिर 700 वर्ष पुराना है |


रानीखेत में स्थित झूला देवी मंदिर पहाड़ी स्टेशन पर एक आकर्षण का स्थान है |यह भारत के उत्तराखंड राज्य में अल्मोड़ा जिले के चैबटिया गार्डन के निकट रानीखेत से 7 किमी की दूरी पर स्थित है।वर्तमान मंदिर परिसर 1935 में बनाया गया है|झूला देवी मंदिर के समीप ही भगवान राम का मंदिर भी है ।


झूला देवी मंदिर को घंटियों वाला मंदिर के रूप में भी जाना जाता है | हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार इस मंदिर का निर्माण क्षेत्र में रहने वाले जंगली जानवरों द्वारा उत्पीड़न से मुक्त कराने के लिए मां दुर्गा की कृपा बनाये रखने के उद्देश्य से किया गया था ।


मंदिर परिसर में झूला स्थापित होने के कारण देवी को “झूला देवी” नाम से पूजा जाता है |

मां के झूला झूलने के बारे में एक और कथा प्रचलित है। माना जाता है कि एक बार श्रावण मास में माता ने किसी व्यक्ति को स्वप्न में दर्शन देकर झूला झूलने की इच्छा जताई।


ग्रामीणों ने मां के लिए एक झूला तैयार कर उसमें प्रतिमा स्थापित कर दी।
उसी दिन से यहां देवी मां “झूला देवी” के नाम से पूजी जाने लगी।

यह कहा जाता है कि मंदिर लगभग 700 वर्ष पुराना है । चैबटिया क्षेत्र जंगली जानवर से भरा घना जंगल था ।
🌺एक संक्षिप्त,सुन्दर एवं सार्थक कथा🌺

बहुत पुरानी बात है,किसी कल्प में पृथ्वी के एक नगर में एक जुआरी रहता था।वो स्वभाव से ही नास्तिक था तथा वेदों व शास्त्रों की निंदा करता था।एक दिन उसने जुए में बहुत सारा धन जीत लिया था।


धन के मद में चूर वो उस रात पान, फूल,सुगंध लेकर नगर की सबसे महंगी और खूबसूरत वैश्या के पास जा रहा था। एक उजाड़ मार्ग पे उसे ठोकर लगी, उसका सिर एक पत्थर से टकरा गया और वो मूर्च्छित हो गया।

उस स्थान पर शिवलिंग था। मूर्छित होने पर उसके हाथ के फूल,सुगंध शिवलिंग पर अनजाने तरीके से अर्पित हो गए।वहीं पर उस जुआरी की मौत हो गई। मौत के बाद यमराज के दूत आये और उसे पाश में जकड़ कर यमपुर ले गए।


वहां चित्रगुप्त ने उसके कर्मों का लेखा-जोखा देखकर कहा कि इसने तो पाप ही पाप किए हैं,लेकिन मरते समय इसने जुए के पैसे से वेश्या के लिए खरीदे पुष्प,गंध अनजाने रूप से ‘शिवार्पण’ कर दिए।ये ही एकमात्र इसका पुण्य है। चित्रगुप्त की बात सुनकर यमराज ने उससे पूछा कि हे पापी,तू ही बता कि...


...पहले पाप का फल भोगेगा या पुण्य का।
जुआरी बोला की पाप के तो बहुत फल भोगने पड़ेंगे, पहले पुण्य का ही फल भोग लूं। तो उस एक पुण्य के बदले उसे दो घड़ी के लिए इन्द्र बनाया गया।
यमराज स्वर्ग पहुंचे और उन्होने दो घड़ी के लिए अपने पद से इन्द्र को त्यागपत्र देने को कहा।
🌺श्री कृष्ण और स्यांतक मणी की कहानी🌺

एक बार भगवान श्रीकृष्ण बलरामजी के साथ हस्तिनापुर गए। उनके हस्तिनापुर चले जाने के बाद अक्रूर और कृतवर्मा ने शतधन्वा को स्यमंतक मणि छीनने के लिए उकसाया। शतधन्वा बड़े दुष्ट और पापी स्वभाव का मनुष्य था।


अक्रूर और कृतवर्मा के बहकाने पर उसने लोभवश सोए हुए सत्राजित को मौत के घाट उतार दिया और मणि लेकर वहाँ से चला गया। शतधन्वा द्वारा अपने पिता के मारे जाने का समाचार सुनकर सत्यभामा शोकातुर होकर रोने लगी।

फिर भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण कर उसने यह प्रतिज्ञा की कि जब तक श्रीकृष्ण शतधन्वा का वध नहीं कर देंगे, वह अपने पिता का दाह-संस्कार नहीं होने देगी। इसके बाद उसने हस्तिनापुर जाकर श्रीकृष्ण को सारी घटना से अवगत कराया।वे उसी समय सत्यभामा और बलरामजी के साथ हस्तिनापुर से द्वारिका लौट आए।

द्वारिका पहुँचकर उन्होंने शतधन्वा को बंदी बनाने का आदेश दे दिया। जब शतधन्वा को ज्ञात हुआ कि श्रीकृष्ण ने उसे बंदी बनाने का आदेश दे दिया है तो वह भयभीत होकर कृतवर्मा और अक्रूर के पास गया और उनसे सहायता की प्रार्थना की। किंतु उन्होंने सहायता करने से इंकार कर दिया।

तब उसने स्यमंतक मणि अक्रूर को सौंप दी और अश्व पर सवार होकर द्वारिका से भाग निकला।
श्रीकृष्ण व बलराम को उसके भागने की सूचना मिली।अतः उसका वध करने के लिए वे रथ पर सवार होकर उसका पीछा करने लगे।उन्हें पीछे आते देख शतधन्वा भयभीत होकर अश्व से कूद गया व पैदल ही वन की ओर दौड़ने लगा।