बिना जन्मपत्री, कुंडली, ज्योतिष के आप भी यह जान सकते हैं कि कौन सा ग्रह आपको अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव दे रहा है , हमारे ऋषियों ने इसके लिए हथेली के पर्वत से इसका समाधान निकाला है।
प्रत्येक हथेली में नौ क्षेत्र महत्वपूर्ण है
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बृहस्पति का पर्वत – आध्यात्मिकता
शनि का पर्वत – गंभीरता
सूर्य का पर्वत – प्रतिष्ठा
बुध का पर्वत – वाणिज्य
मंगल ग्रह उंचा पर्वत – जीवन शक्ति
चंद्रमा का पर्वत – कल्पना
शुक्र का पर्वत – प्रेम
मंगल ग्रह निम्न पर्वत – क्रोध
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हस्त रेखा में नक्षत्र या तारा
उनके प्रभाव
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1.यदि गुरु पर्वत पर नक्षत्र का चिन्ह हो, तो वह व्यक्ति पूर्ण सफलता प्राप्त करता हैं
2. यदि शनि पर्वत पर यह चिन्ह हो तो,ऐसा व्यक्ति तंत्र-मंत्र गुह्यविधायो का ज्ञाता होता हैं
3.यदि सूर्य पर्वत पर नक्षत्र हो तो पूर्ण धन लाभ होता हैं और प्रसिद्धि प्राप्त होती हैं
4.यदि बुध पर्वत पर नक्षत्र या तारा हो तो व्यापारिक तथा उच्च कोटि का वैज्ञानिक उपलब्धि प्राप्त करता हैं
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5. यदि केतु पर्वत पर हो तो उस व्यक्ति का बचपन अत्यन्त सुख में बीतता हैं

6.यदि शुक्र पर्वत पर हो तो कामुकता व भोग की सामग्रियों से सम्पन्न होता हैं

7.मंगल पर्वत पर नक्षत्र का चिन्ह हो तो वह व्यक्ति साहसी होता हैं अपने पराक्रम से प्रतिष्ठा प्राप्त करता हैं

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8. यदि राहु पर्वत पर हो तो हमेशा भाग्य साथ देता हैं
ऐसा व्यति जुआ में सफलता प्राप्त कर सकता है
9. चन्द्र पर्वत पर इस प्रकार का चिन्ह हो तो व्यक्ति साधक होता हैं या विशिष्ट होता हैं
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10. यदि विवाह रेखा पर नक्षत्र तारे का चिन्ह हो, तो उस व्यक्ति के विवाह में कई प्रकार की बाधाएं आती हैं
11. यदि ह्रदय रेखा पर नक्षत्र चिन्ह हो, तो ह्रदय रोग एवं प्रेम में आघात होता हैं
12. यदि मस्तिष्क रेखा पर हो तो व्यक्ति को मानसिक आघात या शिरोरोग से पीड़ित होता हैं
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13. तर्जनी उँगली पर अगर हो तो यह चिन्ह सभी प्रकार से शुभ माना गया हैं
यह #thread केवल ज्ञानवर्धन के लिए है, कृपया कुंडलियां और जन्मपत्री भेजना शुरू न करें।
धन्यवाद।
जय सनातन 🚩

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#ज्योतिष_विज्ञान #मंत्र_विज्ञान

ज्योतिषाचार्य अक्सर ग्रहों के दुष्प्रभाव के समाधान के लिए मंत्र जप, अनुष्ठान इत्यादि बताते हैं।

व्यक्ति के जन्म के समय ग्रहों की स्थिति ही उसकी कुंडली बन जाती है जैसे कि फ़ोटो खींच लिया हो और एडिट करना सम्भव नही है। इसे ही "लग्न" कुंडली कहते हैं।


लग्न के समय ग्रहों की इस स्थिति से ही जीवन भर आपको किस ग्रह की ऊर्जा कैसे प्रभावित करेगी का निर्धारिण होता है। साथ साथ दशाएँ, गोचर इत्यादि चलते हैं पर लग्न कुंडली का रोल सबसे महत्वपूर्ण है।


पृथ्वी से अरबों खरबों दूर ये ग्रह अपनी ऊर्जा से पृथ्वी/व्यक्ति को प्रभावित करते हैं जैसे हमारे सबसे निकट ग्रह चंद्रमा जोकि जल का कारक है पृथ्वी और शरीर के जलतत्व पर पूर्ण प्रभाव रखता है।
पूर्णिमा में उछाल मारता समुद्र का जल इसकी ऊर्जा के प्रभाव को दिखाता है।


अमावस्या में ऊर्जा का स्तर कम होने पर वही समुद्र शांत होकर पीछे चला जाता है। जिसे ज्वार-भाटा कहते हैं। इसी तरह अन्य ग्रहों की ऊर्जा के प्रभाव होते हैं जिन्हें यहां समझाना संभव नहीं।
चंद्रमा की ये ऊर्जा शरीर को (अगर खराब है) water retention, बैचेनी, नींद न आना आदि लक्षण दिखाती है


मंत्र क्या हैं-
मंत्र इन ऊर्जाओं के सटीक प्रयोग करने के पासवर्ड हैं। जिनके जप से संबंधित ग्रह की ऊर्जा को जातक की ऊर्जा से कनेक्ट करके उन ग्रहों के दुष्प्रभाव को कम किया और शुभ प्रभाव को बढ़ाया जाता है।
🌺श्री गरुड़ पुराण - संक्षिप्त वर्णन🌺

हिन्दु धर्म के 18 पुराणों में से एक गरुड़ पुराण का हिन्दु धर्म में बड़ा महत्व है। गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद सद्गती की व्याख्या मिलती है। इस पुराण के अधिष्ठातृ देव भगवान विष्णु हैं, इसलिए ये वैष्णव पुराण है।


गरुड़ पुराण के अनुसार हमारे कर्मों का फल हमें हमारे जीवन-काल में तो मिलता ही है परंतु मृत्यु के बाद भी अच्छे बुरे कार्यों का उनके अनुसार फल मिलता है। इस कारण इस पुराण में निहित ज्ञान को प्राप्त करने के लिए घर के किसी सदस्य की मृत्यु के बाद का समय निर्धारित किया गया है...

..ताकि उस समय हम जीवन-मरण से जुड़े सभी सत्य जान सकें और मृत्यु के कारण बिछडने वाले सदस्य का दुख कम हो सके।
गरुड़ पुराण में विष्णु की भक्ति व अवतारों का विस्तार से उसी प्रकार वर्णन मिलता है जिस प्रकार भगवत पुराण में।आरम्भ में मनु से सृष्टि की उत्पत्ति,ध्रुव चरित्र की कथा मिलती है।


तदुपरांत सुर्य व चंद्र ग्रहों के मंत्र, शिव-पार्वती मंत्र,इन्द्र सम्बंधित मंत्र,सरस्वती मंत्र और नौ शक्तियों के बारे में विस्तार से बताया गया है।
इस पुराण में उन्नीस हज़ार श्लोक बताए जाते हैं और इसे दो भागों में कहा जाता है।
प्रथम भाग में विष्णुभक्ति और पूजा विधियों का उल्लेख है।

मृत्यु के उपरांत गरुड़ पुराण के श्रवण का प्रावधान है ।
पुराण के द्वितीय भाग में 'प्रेतकल्प' का विस्तार से वर्णन और नरकों में जीव के पड़ने का वृत्तांत मिलता है। मरने के बाद मनुष्य की क्या गति होती है, उसका किस प्रकार की योनियों में जन्म होता है, प्रेत योनि से मुक्ति के उपाय...