SriramKannan77 Authors Vibhu Vashisth

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एक बार भगवान कृष्ण की पत्नी महारानी सत्यभामा को अपनी सुन्दरता का अभिमान हो चला।दरबार में सिंहासन पर बैठे महारानी सत्यभामा ने श्री कृष्ण से अनायास ही पूछ लिया,"स्वामी!आपने त्रेता युग में भगवान राम के रूप में अवतार लिया था तथा सीता आपकी पत्नी थीं।क्या वह मुझसे भी ज्यादा सुन्दर थी?"


श्री कृष्ण सत्यभामा के प्रश्न का उत्तर देते कि उससे पहले ही गरुड़ बोल पड़े,"प्रभु!क्या मुझसे भी ज्यादा तीव्र गति से कोई इस सम्पूर्ण जग में उड़ सकता है।"
ये सुन सुदर्शन से भी नहीं रहा गया और वह भी बोल पड़ा,"भगवन!मैनें बड़े-बड़े युद्धों में आपको विजयश्री दिलवाई है।


क्या संसार में मुझसे भी बड़ा कोई शक्तिशाली है।" तीनों की ये बातें सुन श्री कृष्ण मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे और जान रहे थे कि इन सबमें अहंकार आ गया है जिसे नष्ट करना अति आवश्यक है।तब श्री कृष्ण ने उन तीनो से कहा,"मेरा एक परम भक्त है, हनुमान।तुम तीनों के प्रश्नों के उत्तर वही...


...भलीभांति दे पाएगा। हे गरुड़! तुम तो बड़ी तीव्र गति से उड़ते हो।तुम जाओ और हनुमान को ये कहकर बुला लाओ कि भगवान राम , माता सीता के साथ उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। प्रभु राम और माता सीता का नाम सुनकर वे दौड़े-दौड़े चले आएंगे।" गरुड़ भगवान की आज्ञा लेकर हनुमानजी को बुलाने उड़ चले।

इधर श्री कृष्ण ने सत्यभामा से कहा कि देवी आप सीता के रूप में तैयार हो जाएं और स्वयं द्वारकाधीश ने श्री राम का रूप धारण कर लिया।फिर श्री कृष्ण ने सुदर्शन को आज्ञा देते हुए कहा कि तुम महल के प्रवेशद्वार पर पहरा दो।ज्ञात रहे कि मेरी आज्ञा के बिना कोई भी महल में प्रवेश न करने पाए ।
🌺हनुमान जी ने क्यों धारण किया था पंचमुखी रूप, कैसे हुआ था अहिरावण वध और कौन था मकरध्वज?🌺

श्रीराम और रावण का भीषण युध्द चल रहा था। एक-एक कर रावण के सभी शक्तिशाली योध्दा मारे जा रहे थे।जब रावण का बलशाली एवं पराक्रमी पुत्र मेघनाद भी मारा गया तब रावण गहन चिंता व शोक में डूब गया।


अब उसके पास कोई भी पराक्रमी योद्धा शेष नहीं बचा था। ऐसे में उसे अपने भाई अहिरावण की याद आयी जो पाताल-लोक का राजा था। रावण ने अहिरावण को अपनी सहायता हेतु तुरंत बुलावा भेजा।

विभीषण को शीघ्र ही अपने गुप्तचरों द्वारा इस बात का पता लग गया। विभीषण जानता था की अहिरावण अत्यंत पराक्रमी एवं मायावी राक्षस है, इसलिए उसे श्रीराम और लक्ष्मण की सुरक्षा की चिंता सताने लगी।


जब विभीषण ने हनुमान जी के सामने अपनी चिंता व्यक्त की तो हनुमान जी ने स्वयं श्रीराम और लक्ष्मण जी की सुरक्षा का दायित्व संभाला।
उधर लंकेश के बुलावे की आज्ञा का पालन करते हुए अहिरावण लंका पहुंच चुका था।
रावण ने तब अहिरावण को श्रीराम और लक्ष्मण का वध करने के...


...लिए भेज दिया।
प्रभु राम और लक्ष्मण अपनी कुटिया में सो रहे थे और हनुमान जी बाहर पहरा दे रहे थे। हनुमान जी ने कुटिया के चारों ओर सुरक्षा का अभेद्य घेराव बना दिया था जिसके अन्दर किसी मायावी शक्ति का प्रवेश करना असंभव था।
अहिरावण कुटिया के बाहर तक तो पहुंच गया परंतु मायावी...
कौरव और पांडवों के बीच जब राज्य बंटवारे को लेकर कलह चली, तो मामा शकुनि की अनुशंसा पर धृतराष्ट्र ने खांडवप्रस्थ नामक एक जंगल को देकर पांडवों को कुछ समय तक के लिए शांत कर दिया था। इस जंगल में एक महल था जो खंडहर हो चुका था। पांडवों के समक्ष अब उस जंगल को एक नगर बनाने की चुनौती थी।


खंडहर महल के चारों तरफ भयानक जंगल था। यमुना नदी के किनारे एक बीहड़ वन था जिसका नाम खांडव वन था। पहले इस जंगल में एक नगर हुआ करता था,फिर वह नगर नष्ट हो गया और उसके खंडहर ही बचे थे।खंडहरों के आसपास वहां जंगल निर्मित हो गया था।यहां इंद्रप्रस्थ नगर बसाने के लिए इस जंगल में...


...अर्जुन और श्रीकृष्ण ने आग लगा दी थी।
खांडववन में अग्नि धधकने लगी और उसकी ऊंची ऊंची लपटे आकाश तक पहुंच गई।खांडववन को अग्नि 15 दिन तक जलाती रही।इस अग्निकाण्ड में केवल छह प्राणी ही बच पाते हैं।अश्‍वसेन सर्प, मयदानव(मयासुर)और चार शार्ड्ग पक्षी। आओ जानते हैं कि अश्वसेन सर्प कौन था।


अश्वसेन तक्षक नाग का पुत्र था। खांडववन जल रहा था तब उसकी माता ने उसे अपने मुंह में निगल लिया और वहां से भाग गई।परंतु असहनीय गर्मी के कारण वह बच न सकी। लेकिन अपनी जान दे कर भी वह नागिन अपने मुंह में छुपाए अपने बच्चे को जीवन-दान दे गयी।


अश्वसेन की माता तो मार गयी परंतु अश्वसेन बच गया। उसे अपनी माँ की इस प्रकार मृत्यु का बड़ा दुख हुआ और वो प्रतिशोध की अग्नि में जलने लगा।तत्पश्चात उसका एक ही लक्ष्य था की जिस अर्जुन ने खांडव वन में आग लगाकर उसकी माता के प्राण लिए, वह किस प्रकार उसके प्राण ले।
💞जब केवट ने पार लगाई श्रीराम की नैया 💞
निषादराज गुह मछुआरों और नाविकों के मुखिया थे।श्रीराम को जब वनवास हुआ तो वे सबसे पहले तमसा नदी पहुंचे,जो अयोध्या से 20किमी दूर है।इसके बाद गोमती नदी पार कर वे प्रयागराज से श्रृंगवेरपुर पहुंचे,जो निषादराज का राज्य था।यहीं पर गंगा के तट पर...


..उन्होने केवट से गंगा पार कराने को कहा था।
केवट ने उन्हें उपर से नीचे तक देखा तो वे उन्हें निहारते ही रह गए और समझ गए कि ये प्रभु श्रीराम है।श्रीराम केवट से कहते हैं कि मुझे उस पार जाना है तो क्या मुझे नदिया पार करा दोगे। 

🌺मागी नाव न केवटु आना।
कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना ।।🌺

श्री राम केवट से नाव मांगते हैं पर वह लाता नहीं है।वह कहने लगा कि मैंने तुम्हारा भेद जान लिया है।तुम्हारे चरण कमलों की धूल के लिए सब लोग कहते हैं कि वह मनुष्य बना देने वाली कोई जड़ी है।जिसके छूते ही पत्थर की शिला सुंदर स्त्री हो गई तो मेरी नाव तो काठ की है।काठ तो पत्थर से कठोर...


...भी नहीं होता।यदि मेरी नाव का आपके चरणों से स्पर्श हो गया तो कदाचित वह भी सुन्दर स्त्री हो जाएगी और मेरी रोजी मारी जाएगी।मैं तो लूट जाऊंगा।मैं तो इस नाव के सहारे ही परिवार का भरण पोषण करता हूं,दूसरा कोई धंधा नहीं जानता।

🌺जौं प्रभु पार अवसि गा चहहू।
मोहि पद पदुम पखारन कहहू।।🌺

हे प्रभु!यदि आप अवश्य ही पार जाना चाहते हैं तो मुझे पहले अपने चरण कमल पखार लेने दीजिए।

🌺पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं। मोहि राम राउरि आन दसरथसपथ सब साची कहौं।।
बरू तीर मारहुं लखनु पै जब लागि न पाय पखारिहौं ।।🌺
🌺क्या आपको पता है रानी कमलापति के बारे में?🌺

भोपाल में बने भारत के सबसे हाईटेक रेलवे स्टेशन का नाम रानी कमलापति रेलवे स्टेशन हो गया है, पहले इसका नाम हबीबगंज रेलवे स्टेशन हुआ करता था। आज यह रेलवे स्टेशन किसी इंटरनेशनल एयरपोर्ट को भी मात देता है।


लेकिन हम स्टेशन की भव्यता की नहीं बल्कि उसकी दिव्यता की बात करेंगे, और दिव्यता इस रेल्वे स्टेशन के नाम में है।
जब भोपाल के इस स्टेशन का नाम रानी कमलापति के नाम पर रखे जाने का समाचार लोगों ने सुना तो शेष भारत तो छोड़िये, मध्यप्रदेश भी जाने दीजिये,

भोपाल के नागरिकों तक को भी आश्चर्य हुआ कि ये रानी कमलापति कौन थी? भोपाल को तो नवाबों ने बसाया है, भोपाल में किसी हिन्दू राजा का नाम अगर सुना वो राजा भोज का सुना, तो फिर ये रानी कमलापति कहां से आ गई ?

ये रानी कमलापति हैं कौन?,अगर आपके मन में भी ये सवाल उठा हो,तो समझिये पिछले एक शतक के षड्यंत्र के परिणाम आंशिकरूप से आपके मस्तिष्क पर भी हुए हैं।वे हमें हमारी जड़ों से काटना चाहते थे और कुछ भी कहो वे कुछ हद सफल तो हुए हैं।खैर,रानी कमलापति को मध्यप्रदेश की पद्मावती भी कह सकते हैं।


जैसे पद्मावती ने अपने सम्मान की रक्षा के लिए जौहर किया था, ठीक वैसे ही रानी कमलापति ने भी जलसमाधि ली थी। सोलहवीं सदी में समूचे भोपाल क्षेत्र पर हिन्दू गोंड राजाओं का ही शासन था। कमलापति गोंड राजा निजामशाह की पत्नी थीं।भोपाल के पास गिन्नौरगढ़ से राज्य का संचालन होता था।
पाञ्चजन्य भगवान विष्णु का शंख है। विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण पाञ्चजन्य नामक एक शंख रखते थे ऐसा वर्णन महाभारत में प्राप्त होता है। श्रीमद्भगवद्गीता जो कि महाभारत का अङ्ग है उस में वासुदेव द्वारा कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान इसका इस्तेमाल किया जाना बताया गया है।


महाभारत में श्रीकृष्ण के पास पाञ्चजन्य,अर्जुन के पास देवदत्त,युधिष्ठिर के पास अनंतविजय,भीष्म के पास पोंड्रिक,नकुल के पास सुघोष, सहदेव के पास मणिपुष्पक था। सभी के शंखों का महत्व और शक्ति अलग-अलग थी।

शंखों की शक्ति और चमत्कारों का वर्णन महाभारत और पुराणों में मिलता है।


शंख को विजय,समृद्धि,सुख,शांति, यश, कीर्ति और लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शंख नाद का प्रतीक है।शंख ध्वनि शुभ मानी गई है।हालांकि प्राकृतिक रूप से शंख कई प्रकार के होते हैं।इनके 3 प्रमुख प्रकार हैं-दक्षिणावृत्ति शंख, मध्यावृत्ति शंख तथा वामावृत्ति शंख।


पाञ्चजन्य का रहस्य : पाञ्चजन्य बहुत ही दुर्लभ शंख है। समुद्र मंथन के दौरान इस पाञ्चजन्य शंख की उत्पत्ति हुई थी। समुद्र मंथन से प्राप्त 14 रत्नों में से 6वां रत्न शंख था।
श्रीकृष्ण के गुरुपुत्र पुनरदत्त को एक बार एक दैत्य उठा ले गया। उसी को लेने के लिए वे दैत्य नगरी गए।


वहां उन्होंने देखा कि एक शंख में शंखासुर नाम का दैत्य सोया है।उन्होंने दैत्य को मारकर शंख को अपने पास रखा और फिर जब उन्हें पता चला कि उनका गुरुपुत्र तो यमपुरी चला गया तो वे भी यमपुरी गए।वहां यमदूतों ने उन्हें अंदर नहीं जाने दिया तब उन्होंने शंखनाद किया जिसके चलते यमलोक हिलने लगा।
भ्रामरी देवी दुर्गा के अवतारों में से एक हैं। दुर्गा के सभी अवतारों में से रक्तदंतिका, भीमा, भ्रामरी, शताक्षी तथा शाकंभरी प्रसिद्ध हैं। मां भ्रामरी की पौराणिक ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार, एक समय जब पृथ्‍वी पर अरुणासुर नामक दैत्य ने आतंक का माहौल पैदा किया।


अरुणासुर ने कठोर नियमों का पालन कर ब्रह्मदेव की घोर तपस्या की।तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मदेव प्रकट हुए और अरुणासुर से वर मांगने को कहा।अरुणासुर ने वर मांगा की कोई भी मुझे युद्ध में न हरा सके,न किसी अस्त्र-शस्त्र से मेरी मृत्यु हो, स्त्री-पुरुष के लिए मैं अवध्य रहूं और न ही दो व...


...चार पैर वाला प्राणी मेरा वध कर सके।
साथ ही मैं समस्त देवताओं पर विजय प्राप्त कर सकूं। ब्रह्माजी ने तथास्तु कह कर ये सब वरदान उसे दे दिए। इसके पश्चात अरुणासुर ने सर्वप्रथम स्वर्गलोक पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। देवता अरुणासुर से हारने के बाद घबराकर महादेव की शरण में आए।


महादेव ने सभी देवताओं को देवी भगवती की उपासना करने को कहा।क्योंकि वे ही अरुणासुर का अंत करने में सक्षम हैं।तब सभी देवताओं ने देवी की घोर तपस्या की।प्रसन्न होकर देवी के जिस रूप ने देवताओं को दर्शन दिए,वे चारों ओर से असंख्य भ्रमरों से घिरी हुई थीं।भ्रमर विशेष प्रकार की बड़ी...


...मधुमक्खी होती है।भ्रमरों से घिरी होने के कारण देवताओं ने उन्हें भ्रामरी देवी के नाम से सम्बोधित किया।देवताओं से पूरी बात जानने के बाद देवी ने उन्हें आश्वस्त किया कि अरुणासुर दैत्य का अंत अवश्य होगा और देवताओं का स्वर्ग पे राज पुन: स्थापित होगा।तत्पश्चात देवी भ्रामरी अरुणासुर..
क्या आपको पता है कि भृगु ऋषिकौन थे और भृगु संहिता क्या है?

भृगु संहिता में भृगु जी ने अपने ज्ञान द्वारा ग्रहों, नक्षत्रों की गति को देख कर उनका पृथ्वी और मनुष्यों पर पड़ने वाला प्रभाव जाना और अपने सिद्धांतो को प्रतिपादित किया।


शोध एवं खोज के उपरांत उन्होंने ग्रहों और नक्षत्रों की गति तथा उनके पारस्परिक सम्बंधों के आधार पर कालगणना को निर्धारित किया।

पौराणिक कथानुसार जब भृगु ऋषि को ब्रह्मा ऋषि मंडल में स्थान नहीं मिला तो वे क्रोधित होकर भगवान विष्णु जी के पास पहुंचे।परंतु विष्णु जी निद्रामग्न थे अत: ऋषि के आने का उन्हें पता न चला। अपनी अवहेलना देख भृगु जी ने क्रोधित होकर विष्णु जी के वक्षस्थल...

...पर लात से प्रहार किया जिससे विष्णु जी जाग उठे और उठते ही ऋषि से पूछते हैं कि कहीं उन्हें उनके वक्षस्थल पर लात मारने से चोट तो नहीं लगी। प्रभु का ये आचरण देख भृगु ऋषि को अपनी गलती पर बड़ा पश्चाताप होता है, वे रोने लगते हैं और प्रभु से क्षमा-याचना करते हैं।


दीनदयालु प्रभु विष्णु उन्हें तुरंत क्षमा कर देते हैं। परंतु प्रभु के चरणों पे विराजमान माता लक्ष्मी अपने स्वामी की ये अवहेलना नहीं देख पाती और भृगु ऋषि को श्राप दे देती हैं कि वे कभी भी ब्राह्मण के घर निवास नहीं करेंगी और ज्ञानी एवं सरस्वती के उपासक दरिद्र ही रहेंगे।